Les Miserables
Even the darkest night will end and the sun will rise.
एक रोटी के टुकड़े को चुराने की सजा पांच साल मिले तो एक इन्सान से उसकी इन्सानियत मिटाने के लिए काफी है। पर सोचे ज़रा कि वही सजा बढ़कर १९ साल तक हो, और जब वो उसे भुगत कर बाहर निकले तो वह आदमी रहेगा या हैवान? ऐसा ही एक जवान जिसने अपनी पूरी जवानी के १९ साल - युद्धपोत पर चप्पू चलाने वाले एक गुलाम की तरह बितायी हो, जहॉ खाने के लिए कोड़े हो और पीने के लिए पसीना, जहॉ बोलना एक गुनाह हो और आराम करना पाप, जहॉ सोने के लिए एक गन्दी कोठरी और हर वक्त पैरो में बेड़ियाँ हो, जहॉ नींद एक सपना हो और रोटी खाना एक सुख, ऐसी १९ साल की सजा पाने वाला वह जवान जब कैद से ४६ साल का आदमी बनकर निकला तो वो समाज को किस तरह से देखता - क्या वो समाज को स्वीकार करता? जिस समाज ने एक रोटी के टुकड़े के लिए इतनी बड़ी सज़ा दी वो समाज भी उसको क्यों स्वीकार करता?
और रोटी का टुकड़ा भी किसके लिए चुराया था? अपनी बहन के बच्चो के लिए जो सर्दीओ में भुको मर रहे थे, बाहर भारी बर्फ की वजह से कोई काम भी नहीं मिल रहा था, खुद तो पानी पी के चला लेता लेकीन छोटे बच्चो को तो रोते नहीं देख सकता था? वो एक मज़दूर था, मज़दूरी करके अपनी बहन और उसके बच्चो का पेट भरता था। मज़दूरी न मिलने पर जब पेट की आग पर से अपना काबू गँवाया तब जाके उसने ये कदम उठाया। पर चोरी तो हर हाल मैं चोरी हैं, वो एक रोटी के टुकड़े की ही क्यों नहो? समाज और कानून अपनी जवाबदारी बराबर जानते थे और उन्होेंने निभाई भी, उस मजदुर को ५ साल की सज़ा मिल गयी जो बढ़ते-बढ़ते मज़दूर के जीवन के १९ साल खा गई (बारह साल में चार बार भागने की कोशिश के लिए, दो और साल अंतिम प्रयत्न में सिपाइओ से संघर्ष करने के लिए)। बच्चो का क्या हुआ वो तो कोई नहीं जानता और वाचक भी कभी जान नहीं पायेगे। वो समाज की ज़िम्मेदारी नहीं थे, उनकी भूख़ से समाज और क़ानून को कोई लेन-देन नहीं था, समाज ने एक चोर को सज़ा दी और उसे भूल गया, कानून ने एक मुजरिम को सजा दी और एक गुलामी भेट दी, किसी के पास इतना वक्त नहीं था कि वो ये सोचे कि गुनाह क्यों किया गया था!
उम्रकैद से छूटे उस मज़दूर के पास समाज को देने के लिए सिर्फ तिरस्कार था क्योकि और कोई भावना से वह परिचित न था और करीबी रिश्ता नहीं था। समाज और कानून ने भी तो वो ही भाव से उसे देखा था। बाहर आने पर भी समाज ने उसे मुजरीम ही देखा, न किसी ने काम दिया, न रोटी का टुकड़ा दिया और नाही किसी ने सोने के लिए जगह दी। और बात भी तो सच हैं, अगर हमारे करीब कोई आदमी खड़ा होकर नौकरी या खाना मांगे और अगर हमें पता चले कि यह तो १९ साल की सजा भुगत के आया हुआ हैं तो हमारी प्रतिक्रिया क्या होगी? वो ४६ साल के आदमी ने सारी उम्मीदे छोड़ दी, जब एक कुत्ते ने भी अपनी जगह पर उसे सोने के लिए नहीं दिया तो उसने सारी इंसानियत को इतना कोसा कि अगर उसका बस चलता तो सारे संसार को आग लगा देता।
उसका नाम जिन वालजिन था।
कोई भी भाषा की कुछ ऐसी साहित्य कृतियां रहती हैं जो सिर्फ उस भाषा का सम्मान ही नहीं बढाती किन्तु विश्व में अपना एक मुकाम बनाती हैं, और वह कृति किसी व्यक्ति, भाषा, समाज या काल की न रहते समस्त मानव समाज की होती है। वो मनुष्य जीवन की अमाप सर्जनात्मक शक्तिओ का दर्शन कराती हैं | ऐसी ही एक फ्रेन्च कृति “लेस मिसरबल” (Les Misérables) फ़्रांस में, सन १८६२ के मार्च महीने के दौरान प्रकाशित हुई थी, और उसके लेखक थे विक्टर ह्यूगो (Victor Hugo)। जिन वालजिन उसी पाँच विभागो (वॉल्यूम) में विभाजित कथा का एक नायक है| यह कथा फ्रेंच भाषा में लिखी गयी और बाद में दुनिया की कई भाषाओ में अनुवादित की गयी और कई बार इसका रेडियो, नाटक, टेली-सीरीज, फिल्मो में रूपांतरण किया गया। आज भी इस कृति पर से दुनिया भर में ओपेरा चल रहे हैं, पुस्तके प्रकाशित की जा रही हैं, इस कथा के कोई एक पात्र को लेकर उसकी पूरी कहानी प्रस्तुत की जा रही हैं, और… आज भी जब लोग इसे पढते हैं, या इसका रूपांतरण देखते हैं, या सुनते हैं, तब उनकी आँखे भीग जाती हैं।
ऐसा क्या हैं जो आज भी इसकी लोकप्रियता को बनाये रखे हैं? ऐसा क्या हैं जिसे एक बार पढने पर भी इंसान नहीं भूल पाता, और फिर भी उसे बार बार पढने की इच्छा रखता हैं? इसका जवाब अगर खोजे तो उसी कृति की प्रस्तावना में लेखक ने जो कहा हैं उससे मिल सकता हैं। लेखक ने कहा हैं -
“चारो और संस्कृति के बाह्य आडम्बरो के होते हुए भी, विश्व में जब तक कानून और रुढिवादिता के कारण, मनुष्य - मनुष्य के बीच तिरस्कार और जहाँ-तहाँ दुःख से नरक का निर्माण इस पृथ्वी पर होता रहेगा, और जब तक सदीकी तीन महान समस्या - गरीबी से पतित होता मनुष्य, भूख के कारण अपना जिस्म बेचती नारी और अध्यात्मिक एवं प्रणालीगत शिक्षा के आभाव से क्षुद्र बनता बालक - का हल नहीं होता, या फिर संक्षिप्त रूप से कहे तो विश्व में जब तक दीनता और अज्ञान की ये विकट परिस्थिति निर्माण होती रहेगी और जो मनुष्य के उज्वल भविष्य को अंधकारमय बना देगी तब तक इस प्रकार के पुस्तको की उपयोगिता कम नहीं होगी।”
और लेखक कितने सही थे इस बात को लेकर… ये भले ही डेढ़सौ साल पुरानी कथा हो, पर आज भी जब पढते हैं तो वो हमारे समाज की लगाती हैं, हमसे जुडी हुई लगती हैं, और आज भी हमें दिल में चुभती हैं। या इसलिए की आज भी लेखक ने बतायी तीन समस्या के समाधान ढूंढ नहीं पाये हैं। जब हम कथा के कुछ प्रमुख पात्र - फेन्टीन, कोसेंट, मेरियस, थेनार्डियर दंपति, गावरोस, एपोटिन, को मिले तो लगता हैं यह हमारे ही आस-पास दिखाई देते हैं, और कुछ तो हमें - अपने में उनका प्रतिबिम्ब मिलता हैं। एक और पात्र हैं - जेवर्ट; वो कथा का एक विशिष्ठ नायक है, जो की एक निष्ठावान और ईमानदार पुलिस अधिकारी हैं, हो सकता है वो आज हमारे आस-पास नज़र न आये।
वाचक ये न मान ले कि यह एक दुःखद कथा मात्र हैं, किन्तु थोडा और सोचे (बेशक पढने के बाद) तो इसमें मनुष्य जीवन के उस सुन्दर पहलु की ओर प्रकाश डाला हैं, जिस वजह से यह दुनिया आज भी बारूद के ढेर पर कायम हैं, उस जीवन संगीत की बात हैं जिससे यह संसार मोहित हैं। इसमें वो सुगंध हैं जिसे लेके आज भी मनुष्य होने पर हम गर्व कर सकते हैं। यह मनुष्य को मनुष्य से - संवेदना और समर्पण के एक धागे से बांधने की कथा हैं। ये शौर्य, त्याग और दिव्य प्रेम की कथा हैं| यह दुखियारो (लेस मिसरबल्स) की कथा हैं जो दुसरो को खुश रखने में अपना जीवन समर्पित करते हैं। यह है मानव धर्म का महा काव्य ।
यह अलग बात हैं कि उस ज़माने में जब ये कृित प्रकाशित हुई तो समकालीन आलोचको ने इसे आड़े हाथ लिया था, लेकिन आज दुनिया उन आलोचको का नाम भी नहीं जानती है जबकी इस कृति को आदर के साथ आज भी पढ़ा जाता हैं।
[My first hindi article - written long ago but wanted special one to read it first.]
Thus said Dinesh Gajjar
Published at 6:40 pm, Jun 22nd 2014