Once upon a time

When I run, I feel His pleasure

एक समय की बात हैं…

एक समय की बात हैं, जब रूस के महान चिंतक विश्व की प्रवर्तमान समस्याओ के बारे मे विचार करते हुवे रूस के कोई गांव से गुज़र रहे थे। ये दूसरे विश्वयुद्ध का समय था और जर्मन सेना रशिया में प्रवेश कर चुकी थी। चलते चलते एक मोड़ आया जहा उन्हें एक खेत से गुज़रना था, उन्हों ने खेत की मध्य में से जा रही एक कच्ची छोटी सड़क से गुज़रना था। मन में विचारो के द्वन्द के साथ वह यह रस्ते आगे चल पड़े। तभी उन्हों ने देखा की खेत में एक किसान अकेला ही हल जोत रहा हैं। वह किसान की भी नज़र इस चिंतक पर पड़ी। हलाकि चिंतक को नहीं पहचानता था, उसने चिंतक का अतिथि सत्कार किया और अपने साथ खाने के लिए आमंत्रित किया। चिंतक को कुछ खाए काफी वक्त हो चला था और सूरज भी सर पर आ गया था तो तत्त्वचिंतक ने भी आमंत्रण स्वीकार किया और उसके साथ पेड़ के निचे बैठ कर भोजन लिया। बातो-बातो में उन्हें ये विचार आया की चलो इसे किसान की भी राय लेते हैं की इस विश्वयुद्ध के बारे मे वह क्या सोचता हैं या फिर उसे पता भी हैं की कोई लड़ाई हो रही हैं।

चिंतक ने किसान से पूछा - “यह रशिया और जर्मनी के बीच में जो लड़ाई हो रही हैं उसके बारे में आप क्या केहना चाहते हैं?” इस प्रश्न के उत्तर में किसान ने कहा - “महाशय, में नहीं जानता की जर्मनी और रशिया कौन हैं, आप देख ही रहे हैं मेरा पूरा वक़्त इस खेत में मेहनत करते गुज़र जाता हैं। में यह भी नहीं जनता की ऐसे कोई नाम के लोग पड़ोस वाले गांव में भी हैं क्या? पर अगर आप ने बताया हैं तो ज़रूर वह नाम के लोग होगे, और लड़ाई की कोई वजह भी होगी। मुझे मालूम नहीं की वह लोग कैसे अपना झगड़ा खत्म करे, पर इतना कह सकता हूँ की जब मेरा और मेरी पत्नी का झगड़ा होता हैं उस दिन मैं खेत में ज्यादा महेनत करता हूँ और वह घर को साफ़ करने में वक्त लगा देती हैं। रात को जब मैं घर जाता हूँ तो हम दोनों साथ बैठके खाना कहते हैं, युकी हम दोनों ने खूब महेनत की होती हैं, हम लोगो को खाना बहोत मीठा लगता हैं, उस दिन जल्दी सो जाते हैं और गहरी नींद भी आती हैं। सुबह जब उठाते हैं तो इतना ताज़ा और शुद्ध महसूस करते हैं की फिर लड़ाई की बात ही नहीं होती हैं और सुबह की चाय हम साथ बैठ के पीते हैं, तभी ना तो लड़ाई की बात होती हैं और नहीं कोई गीले शिकवे।वजह ये होती हैं की दोनों को लगता हैं की मेरा जीवनसाथी मुजसे अधिक स्नेह करता हैं। तो आप भी रशिया और जर्मनी से जाके कह दीजिये की अपने खेत मैं खूब महेनत करे और जब थक जाये, भूख लगे तभी घर जाये और खाना खाके सो जाये, फिर देखिये लड़ाई कैसे होती हैं?” और अगर उनके पास खेत नहीं हैं तो पौधे लगाए।

यह बात सुन कर वाचक अनुमान लगा सकते होंगे की उस तत्त्व चिंतक ने क्या सोचा होगा। वर्त्तमान समय में हो रहे वैश्विक, राजकीय, सामाजिक घटनाक्रमो में सोचना होगा की कहा ये कहानी उपयुक्त हैं? हैं भी या नहीं? उसके अतिरिक्त वार्ताकार का कोई प्रयोजन नहीं हैं की इस कथा का निष्कर्ष बताये, वाचक समझदार हैं और वार्ता का - इस बोध कथा का अर्थ अपने आप में बड़ी उमदा तरीके से निकाल सकते हैं।

अस्तु।


Thus said Dinesh Gajjar
Published at 8:00 pm, Dec 22nd 2022