Has not seen sunlight
A life untouched by sunlight has never learned to shine
I got a chance to prepare short documentary when I was working at Aptus Health (now WebMB on this date). For preparation, I wrote following few lines in august 2017 as script and then added narration to captured videos shot by various team members in my cultural team. I prepared final video using iMovie app. I come across this document recently and thought of sharing with you.
धूप नहीं देखी है …
अक्सर मन यह सोचता हैं, जब आँखें स्क्रीन के सामने होती हैं
कुछ पाने की ख्वाइश में क्या पीछे छूट गया हैं,
AC की ठंड में रिस्तो की गरमी कही खो गए है,
एक अरसा हो गया की धूप नहीं देखी है
स्क्रीन को देखते कब एक घंटा दिन बन गया,
कब दिन महीनो में तब्दील हूवे, और महीने सालो में
एक अरसा हो गया आईने में वह मुस्कराहट नहीं देखी हैं
एक अरसा हो गया की धूप नहीं देखी है
वह एक दौर था जब वक़्त की बहोत फ़िज़ूल खर्ची करते थे,
बिना अप्पॉइंटमेंट के बाग़ में घंटो किसीका इंतज़ार करते थे
वक़्त तो आज भी कटता हैं लोगो के इंतज़ार में,
मीटिंग रूम ने बाग़ की जगा ली हैं, पर वोह इन्तेज़ारी यहाँ नहीं देखी हैं
एक अरसा हो गया की धुप नहीं देखी है
दोस्तों से तो दूर की बात हैं, अब रिश्ते भी कॉल पे निभाए जाते हैं
दसहरा मॉनिटर को तिलक करके और दिवाली मिठाई का फोटो फेसबुक पर शेयर करके मनाई जाती हैं
बैसाखी के गीत हैडफ़ोन में सुन लेते हैं, होली तो अब स्क्रीन पे ही रंग लेते हैं
राष्ट्र गीत पर अब तो सिर्फ थिएटर में ही खड़े होते हैं, और उठे जज्बातो को सेल्फी के पीछे छोड़ देते हैं
एक अरसा बीत गया परिवार ने मिलके रोटी नहीं खाई हैं
जहा देखो वह, छोटा हो या बड़ा, हर वक़्त स्क्रीन में डूबा रहता हैं,
सुख की बात हो या दुःख, सोशल साइट में जाहिर करता हैं
भगवान् के दर्शन अब मॉनिटर के पैरो में पढ़कर करते हैं
एक अरसा बीत गया की मंदिर की वोह घंटे की रणकार नहीं सुनी हैं
एक अरसा हो गया मस्जिद की सीढिया नहीं देखी हैं
कभी पत्तो पे देख ओस, कही से बचपन पुकारता हैं,
पर कॉनफेरेन्स कॉल के चक्कर मैं वह मौसम चला जाता हैं
अब बारिस को खिड़कियों से ही देखा जाता हैं
और कभी एक आँसू भी निकला तो बारिस की बून्द के साथ बह जाता हैं
एक अरसा हो गया की बारिस में भीगती जवानिया नहीं देखी हैं
की बारिस में बनती कहानिया नहीं देखी हैं
मन करता हैं छोड़ के सब वही कही पेड़ के निचे बैठ धुप देखी जाये,
मयखाने को छोड़ कभी खेत में धुप भी पि जाये
यह सोच कर कदम उठते हैं, फिर पड़े बोझो के जख्म याद आते हैं
बढ़ते कदम रुक जाते हैं, उठी आँख फिर जुक जाती है,
और मन को मरकर अगली मीटिंग की तैयारी में निकली आहें डूब जाती हैं
एक अरसा हो गया धूप नहीं देखी हैं …
Here is final output where it was used to narrate the story…
Thus said Dinesh Gajjar
Published at 5:47 pm, Dec 28th 2022