
रद्दी की दुकान
जो कुछ भी आपके पास है वह एक दिन बेकार हो जाएगा
बिच बाज़ार रद्दी और पुराने किताबो की दुकान पर बैठ वह अपनी पायी हुई किस्मत और मिली विरासत को लेकर अपने आप को और अपने पिता को कोस रहा था। शोच रहा था की विरासत में यह दुकान मिली हैं जहा रोज़ लोग अपनी सबसे बेकार वास्तु आकर दे के जाते हैं, कोई अपनी अच्छी वस्तु नहीं छोड़ के जाते। वह रो रहा था अपनी किस्मत पर की ये भी क्या कोई जीना हैं जहा बस एक यंत्रवत काम करते रहना और रात को घर जा के खाना खा के सो जाना। सुबह उठाना और दुकान पर एके बैठ जाना। यहाँ तो लोगो की लाइन भी नहीं लगती, लोग या तो घर पे बुलाते है और अगर आना हैं तो अपनी फुरसत में आएंगे। बस वही दुश्चक्र (vicious circle) में फिरता रहेगा।
पर थोड़ा अगर पीछे मुडके देखता अपनी दुकान पर तो वह पुरानी ही सही कही किताबे पड़ी थी, जो डिग्री भले ही न दे पर ज्ञान तो वही देती, जिसके लिए वोह बानी थी। क्रांति का बीज तो बोया जा सकता था।
१८वी सदी तक घोषणाकर्ता (town crier), टेलीग्राफ लाइन ऑपरेटर (Telegraph Line Operator), रास्तो पे लगी बत्तीओ को दिया जलाने वाला (Oil Lamp Lighter) ऐसे अनगिनत काम जो अच्छा खासा रोजगार देते थे वो आज अस्तित्व में नहीं हैं। लोगो को पता भी न होगा की ऐसे किसी काम के लिए इन्सान भी रखे जाते थे। यहाँ पे दी गयी एक बूट पुलर हुक की इमेज देख के अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते हैं की एक ज़माने में इसका एक विस्तृत कारोबार हुआ करता था। क्या आपको पता हैं की ऐसी बहोत सही चीजे जो आज हम इस्तेमाल कर रहे हैं वह २०५० तक हमारे जीवन से चली जाएगी ? जैसे की, कार key, टीवी रिमोट कंट्रोल्स, प्लास्टिक डेबिट/क्रेडिट कार्ड, USB फ्लॅश ड्राइव्स, पेपर बोर्डिंग पास, या स्टीयरिंग व्हील कार से। यह तो बस एक छोटासा उदाहरण हैं। पहले जो सदिया लगाती थी आज विज्ञानं और अविष्कार से गति बहोत बढ़ गयी है, जो हमें अपने जीवन काल में देखि जाएगी।
अभी सब कड़ियों को जोड़े तो पता चलेगा की अविरत आविष्कार और विज्ञानं के विकास से मानव जीवन भले ही अच्छा हो किन्तु रोजगार के लिए नया कौशल प्राप्त करना होगा, निरंतर नया सीखना होगा, और जो काम के लिए आप भुगतान लेते थे उसके दसवे भुगतान पे करना पड सकता हैं। नए रोज़गार पुराने रोज़गार की जगह लेते रहेंगे, सवाल ये हैं की क्या हम तो रद्दी वाले की तरह उस कौशल प्राप्त करने के रस्ते से मुँह फेर कर तो नहीं बैठे हैं ना? वरना हम भी अपने नसीब को कोसते रहेंगे जब की हमें सिर्फ मुडके देखना हैं।
आपको क्या लगता हैं आगे ऐसे कोनसे रोज़गार हैं जो अगले पांच साल में नहीं रहेंगे?
Thus said Dinesh Gajjar
Published at 01:30 am, March 2nd 2026 from Home, Sarvodaya Anand