पुस्तकालय और समाज

समाज को पढ़ने की आदत चाहिए

मुझे किताबों की खुशबू पसंद है। जब भी मैं किताबें देखता हूँ, एक अकल्पित, अदृश्य आकर्षण होता है। मुझे खाना जितना आकर्षित नहीं करता है उतनी किताबों से भरी दुकान आकर्षित करती है। आज भी कहीं से गुजरते वक्त, किताबों की दुकान या लाइब्रेरी दिखे तो मुझे वहाँ पहुँचने का मन हो जाता है। यह किताबों को पढ़ने और उसके प्रति आकर्षण मुझे मिला है मेरे पिताजी से। उन्होंने कोई प्रवचन न देते हुए, बस घर किताबें लाते गए और कभी जब भी वक्त मिले, खुले आकाश में, तारों के नीचे, कहानी अपने हिसाब से बताते और कहते, “पता है ये कहाँ है? इस किताब में” और किताब का नाम बताते। वह उत्सुकता बढ़ाते गए, और यह एक दिन में नहीं हुआ, धीरे-धीरे वह इस तरह हमारी रगों में कब वह घुस गया पता ही नहीं चला। पर इसकी शुरुआत कॉमिक बुक्स से हुई थी, और धीरे-धीरे वह शब्दों से कल्पना के चित्र बनाते गए और आज तक वह जारी है।

बहुत सी किताबें पढ़ी हैं, और मुझे लगता है उनमें से कई किताबों को फ़िल्म या नाटक में रूपांतरित करना मुश्किल होगा। क्योंकि जिस तरह से वह लिखी गई हैं (और जब लिखी गई थीं), उसका हेतु कुछ अलग ही था। आज कई सारे लेखक किताबें इस तरह से लिखते हैं कि आप जैसे उसमें से फ़िल्म की स्क्रिप्ट आसानी से बना सकते हैं, पर पहले ऐसा नहीं था। वह सिर्फ मनोरंजन का साधन न होते हुए कई बार क्रांति की चिंगारी बनी है, कई बार परिवर्तन का बड़ा हिस्सा बनी हैं – फिर यह परिवर्तन राजकीय हो, सामाजिक हो या शैक्षणिक। उसका एक दृष्टांत है “अंकल टॉम्स कैबिन”। जिसने पढ़ी है वह जानते हैं। पर यह एक किताब की बात हुई। ऐसी बहुत सी सारी किताबें लिखी गई हैं जिसने मानव जीवन में समाज पर असर छोड़ा है। ऐसी किताबें प्रिंट होकर पड़ी हैं बहुत सारी लाइब्रेरियों में। हो सकता है हम सब किताबें घर नहीं ला सकते लाइब्रेरी से, पर हम लाइब्रेरी तो जा सकते हैं? इसी लिए लाइब्रेरियाँ हुआ करती हैं। और इन्हीं लाइब्रेरियों में खजाना छुपा है – सिर्फ मनोरंजन का नहीं, वैचारिक शक्ति का। वह सिखाती हैं कैसे सोचना चाहिए, न कि क्या सोचना चाहिए। वह दिमाग की भूख मिटाती हैं। वह मानव इतिहास का सबसे लंबा वार्तालाप है जो पड़ा है लाइब्रेरियों में धूल खाते।

मैंने कहीं पढ़ा था कि समाज कैसा है उसका अनुमान उससे लगा सकते हो कि उसमें कितने अनाथाश्रम या वृद्धाश्रम हैं, हॉस्पिटल्स, स्कूल्स, लाइब्रेरियाँ कितनी हैं। अनाथाश्रम और वृद्धाश्रम अगर बहुत हैं तो यह एक अच्छे समाज की पहचान नहीं है। उसके विपरीत, अगर समाज में स्कूल्स, लाइब्रेरियाँ अगर ज्यादा हैं तो एक अच्छे समाज की परिभाषा में आ सकता है। पर अब ये लाइब्रेरियाँ मुश्किल समय में हैं। पहले टीवी का आविष्कार, फिर मोबाइल, टैबलेट्स और अब एआई, यह सब एक के बाद एक लाइब्रेरियों को समाप्त करने अपना दायित्व बढ़-चढ़कर निभा रहे हैं।

एआई ने वह आविष्कार किया है कि अब वह आपके लिए किताब लिख सकती है। आप अपना विचार प्रकट करें और उसके आजू-बाजू वह किताब लिख लेगी। किंतु वह मनुष्य से अपना बहुत बड़ा हक अवचेतन रूप से छीन रही है, और वह है – सोचना, विश्लेषण करना, और दिल में उठी उर्मियों को अभिव्यक्त करना।

तो जिम्मेदारी अभी हम पर है। हम एआई या उसके उपयोग को हटा नहीं सकते, और वह हटना भी नहीं चाहिए, सिर्फ विवेकपूर्ण उपयोग महत्व का है। और यही महत्व है – “विवेकपूर्ण”। यही हमारी सबसे बड़ी चुनौती है, हम अपने कदम किस ओर लेकर जाएँ, अपनी आने वाली पीढ़ी को कहाँ लेकर जाएँ। यह कदम ही हम मनुष्यों का भविष्य तय करेगा।

सवाल यह है करेंगे कैसे? और यक्ष प्रश्न यह है – क्या हम सच में ये करना चाहेंगे?


पीढ़ी दर पीढ़ी ज्ञान

Thus said Dinesh Gajjar
Published at 12:11 am, May 31st 2026 from Home, Sarvodaya Anand