
वह शक्ति जिसकी हमने इतने लंबे समय से उपेक्षा की है
स्वतंत्रता संघर्ष श्रृंखला
अगर मैं आपसे कहूँ कि,
- “Stuart Weitzman”, “Christian Louboutin” जैसे ब्रांड आज महिलाओं के फुटवियर में शीर्ष नामों में गिने जाते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि एक समय ऐसा था जब महिलाओं को चप्पल पहनने की मनाही थी? इसे धर्म से जोड़कर जूते पहनना पाप माना जाता था? मुख्य रूप से महिलाओं के लिए?
- अगर वह किसी खास जाति में पैदा हुई हो, तो ब्लाउज भी नहीं पहन सकती थी?
- महिलाओं का साइकिल चलाना नैतिक दृष्टि से प्रतिबंधित होना चाहिए, ऐसी माँग डॉक्टरों और विद्वानों ने की थी, और महिलाओं का साइकिल चलाना समाज के लिए खतरा माना जाता था? यह विचारधारा यूरोपीय देशों में प्रचलित थी?
- महिलाओं को हँसते समय अपने दाँत ढकने पड़ते थे और सार्वजनिक रूप से मुँह खोलकर हँसने वाली महिला का चरित्र अच्छा नहीं माना जाता था?
- 1945 तक भी कैम्ब्रिज में महिलाओं को फेलो के रूप में रॉयल सोसाइटी में प्रवेश करने की मनाही थी?
- विकासशील कहे जाने वाले देशों की तुलना में आधुनिक माने जाने वाले देशों में भी महिलाओं को मतदान का अधिकार बहुत देर से मिला?
- पेरिस में महिलाओं के पैंट पहनने पर तकनीकी रूप से प्रतिबंध लगाने वाला कानून 2013 में आधिकारिक रूप से निरस्त किए जाने तक लागू था। अमेरिका के विभिन्न राज्यों और कार्यस्थलों में भी बीसवीं सदी के काफी लंबे समय तक महिलाओं के पैंट पहनने पर प्रतिबंध लगाए गए थे।
- नेपाल के कुछ क्षेत्रों में मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को झोपड़ियों में रहने के लिए भेज दिया जाता था। कुछ महिलाओं की मृत्यु ठंड या जंगली जानवरों के हमलों के कारण हो जाती थी। इस प्रथा को 2017 में ही अपराध घोषित किया गया था, और आज भी यह जारी है।
यह सब जो लिखा है, वह मानव जीवन के इतिहास का एक प्रतिशत भी नहीं है और पिछले दो सौ वर्षों की बात है। अगर इससे भी पीछे जाएँ, तो बहुत कुछ ऐसा पढ़ने को मिलेगा कि आप सोचेंगे कि यह कैसा? अरे, पिछले 100 वर्षों में भी ऐसे उदाहरण हैं, जिन्हें देखकर और पढ़कर आपको सदमा लग सकता है।
मुद्दे की बात यह है कि जिसे कोई पीड़ा नहीं है, उसे पीड़ा में जी रहे व्यक्ति की तकलीफ का कोई अंदाजा नहीं होता। जब ब्रिटेन में लोकतंत्र की हिमायत की बातें हो रही थीं, तब वहीं महिलाएँ कई महत्त्वपूर्ण विषयों में स्वतंत्र नहीं थीं। सरल भाषा में कहें तो लोगों को जब खुद कोई तकलीफ होती है, तब लगता है कि अब क्रांति होनी चाहिए।
महत्त्वपूर्ण बात यह है कि जब तकलीफ हुई — खुद को तकलीफ हुई — तब रास्ता खोजने निकल पड़े। लेकिन जब किसी दूसरे को तकलीफ हुई हो और आप उसे उस तकलीफ से बाहर निकालने का प्रयास करें, तो यह एक नेक कार्य है और प्रशंसा के योग्य है। ऐसी विभूतियों ने इतिहास बदला है। कुछ यूरोपीय समाजों का बहुत पुराना नहीं, बल्कि ऐसा इतिहास है कि जिस महिला को पढ़ना-लिखना आता था, उसे डायन कहकर मौत के घाट उतार दिया जाता था! दूर क्यों जाना? भारत में ही अभी डेढ़ सौ साल पहले घर की महिलाओं को भी पढ़ाई का अधिकार नहीं था? अगर अधिक जानना हो, तो महात्मा फुले और सावित्रीबाई फुले की जीवनियाँ पढ़िए। पता चलेगा कि कितनी कठिन परिस्थितियों में उन्होंने क्रांति की मशाल जलाई थी।
लेकिन जब महिलाओं की स्थिति सुधारने की बात आती है (सिर्फ शैक्षणिक नहीं), उन्हें आधिकारिक रूप से निर्णय लेने की शक्ति देने की बात आती है, काम करने की बात आती है, तब पुरुष अवचेतन रूप से आदेश दे देते हैं। अवचेतन रूप से तय कर लेते हैं कि यह महिला का काम है।
यहाँ महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सशक्त पुरुष के पास अधिकार है (यह अधिकार कैसे आया? तो सामान्य रूप से यह स्वीकार कर लिया गया कि पुरुष है, इसलिए अधिकार उसी के पास है। इस विषय पर भविष्य में कभी बात करेंगे।) और यह अधिकार एक जिम्मेदारी माँगता है, लेकिन ऐसी समझ विकसित नहीं हुई है।
अगर मुद्दे को केवल महिलाओं के अधिकारों तक ही सीमित रखें, तो पुरुष सामान्य रूप से महिलाओं के प्रति सहिष्णु नहीं रहे हैं। शिक्षा आई और समझदारी बढ़ी, तो क्या यह भेदभाव और असहिष्णुता कम नहीं होनी चाहिए थी? या फिर महिलाओं की स्वतंत्रता का यह छिपा हुआ डर (Fear of Freedom) क्यों है? इसकी जड़ें किसी एक दशक में नहीं, बल्कि सदियों में और मानव जीवन में जिस तरह मन को प्रोग्राम्ड (तैयार) किया गया है, उसमें हैं।
जिस समाज और संस्कृति ने महिलाओं को केवल एक वस्तु (Object) के रूप में नहीं, बल्कि एक शक्ति के रूप में देखा है, उस समाज या संस्कृति ने प्रगति की है। भारत का वैदिक समाज इस घटना का एक अच्छा उदाहरण कहा जा सकता है।
आज नवरात्रि के पहले दिन, वैदिक धर्म जिस शक्ति की पूजा करता है, वह शक्ति हम सभी के घरों में विभिन्न रूपों में सुप्त अवस्था में विराजमान है। उस शक्ति को जागृत करने की जिम्मेदारी हमारी है। केवल इतना ही नहीं, घर में रहने वाले पुरुषों को (चाहे वे बच्चे हों या बड़े-बुजुर्ग) भी यह समझाने की जरूरत है कि उस शक्ति को शक्ति क्यों कहा जाता है। उस शक्ति (माँ, बहन, पत्नी, बेटी या बहू) को भी शिक्षित करना होगा कि उसके भीतर मौजूद शक्ति का उपयोग परिवार और समाज के विकास के लिए कैसे किया जा सकता है? यह क्रांति वैचारिक रूप से जड़ से करनी होगी और बहुत कठिन, असहज सवालों का सामना करना होगा तथा उनके जवाब खोजने होंगे।
मानव जीवन की कई समस्याओं का समाधान इस शक्ति के जागृत होने से आएगा। अगर हम केवल अपने घर में भी इतना कर पाएँ, तो हमें एहसास होगा कि जीवन में अभूतपूर्व सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिलेगा।
सारतत्त्व
पूजा न करने की संभावना हो सकती है, लेकिन अनादर नहीं होना चाहिए, जो आज हर समय और हर जगह लगातार हो रहा है।
रत्नकणिका
एक घर में एक सुंदर दीपक था। पीढ़ियों से उस दीपक को घर में सँभालकर रखा जाता था। घर के लोग उसे कीमती मानते थे, त्योहारों पर उसकी पूजा करते थे और मेहमानों को गर्व से दिखाते थे।
लेकिन वर्षों तक किसी ने उस दीपक को जलाया ही नहीं था।
एक दिन घर में अँधेरा हो गया। घर के लोग रोशनी खोजने लगे। किसी ने महँगी मोमबत्तियाँ खरीदीं, किसी ने बाहर से दीपक मँगवाए, तो किसी ने अँधेरे को ही जीवन का हिस्सा मान लिया।
तभी घर के एक बच्चे ने पूछा, “हमारे पास इतना सुंदर दीपक है, तो हम इसे जलाते क्यों नहीं हैं?”
घर के बुजुर्ग ने जवाब दिया, “यह दीपक तो खास है। इसे सँभालकर रखने के लिए है, रोजमर्रा के इस्तेमाल के लिए नहीं।”
बच्चे ने फिर पूछा, “लेकिन जो दीपक अँधेरा दूर नहीं कर सकता, उसे सँभालकर रखने का क्या अर्थ है?”
बुजुर्ग के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था।
उस दिन पहली बार दीपक जलाया गया। वर्षों से घर में मौजूद प्रकाश पूरे घर में फैल गया।
Thus said Dinesh Gajjar
Published at 11:00 pm, Sun Oct 11th 2026 from Campal, Panji.