
जो शब्दों में समाता नहीं
साने गुरुजी सही थे
साने गुरुजी ने माँ की महिमा पर पूरी पुस्तक “श्यामची आई” लिखी, और फिर भी उन्होंने कहा कि मैं पूरा न्याय नहीं कर सका। संस्कृत में श्लोक है — “पुत्रः कुपुत्रः भवति, माता कुमाता न भवति”। पुत्र कुपुत्र हो सकता है, माता कुमाता नहीं होती। जिन घटनाओं में माँ को दोषी ठहराया जाता है, उनमें भी अधिकांशतः माँ की मंशा तो बच्चे को उत्तम जीवन देने की ही होती है। रामायण में भी भले ही साधारण बुद्धि से दोष कैकेयी को दें, पर हमें भी पता है कि उनका उद्देश्य अपने बेटे को गद्दी दिलाना था — यह अलग बात है कि उनकी विचार-क्षमता एक सीमित वृत्त में बँधी हुई थी।
जो भी हो, आज मुझे यहाँ जो लिखना है, वह मेरे जीवन की एक घटना है।
१९८४ के आसपास का वह काल था, और शहर नासिक था। मेरी उम्र रही होगी सात-आठ वर्ष। हम इंदिरा नगर में रहते थे। सब लोग अलग-अलग बंगलों में रहते थे, जो चारों ओर खुले होते थे। बंगला यानी बड़ा नहीं — एक कमरा-रसोई, या शायद 1 BHK — पर कमरे, रसोई, बरामदा और ओसरी बड़े होते थे। एक छत के नीचे हम लगभग आठ लोग रहते थे। वह किराए का घर था। उस समय हमारे यहाँ टेलीविजन नहीं था, और मनोरंजन के साधन कम थे। इंदिरा नगर के ओपन थिएटर में वार्षिक कार्यक्रम होते थे, जिनमें सोसाइटी के लोग भाग लेते थे। ऐसे ही एक अवसर पर मेरी माँ ने मेरा नाम एक बाल कविता के लिए लिखवाया था, जिसमें मुझे कुछ सरल नृत्य-भंगिमाएँ करनी थीं। वे मुझे मेरी माँ ने ही सिखाई थीं।
मेरी माँ स्वयं भी कलाकार थीं, और अच्छी डांसर थीं। उनके कई गुण मेरे बड़े भाई और बहन में आए हैं। जब वे स्वयं युवा थीं, तब अपने पीहर (जामनगर) में कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेती थीं। फिर वह नृत्य हो, चित्रकला हो, रंगोली हो, या कुछ भी ऐसा हो जिसमें अभिव्यक्ति की गुंजाइश हो — मेरी माँ ने किसी न किसी रूप में भाग लिया था, और कम साधनों में भी उत्कृष्ट प्रदर्शन किया था।
मेरे लिए बहुत मेहनत से पोशाक भी कई दिनों की मेहनत के बाद बनाई। वह भी घर के सब लोगों की सुविधा का ध्यान रखते हुए, किसी को असुविधा न हो इसलिए रात में जागकर। उसके अलावा उन्होंने मुझे एक बहुत ही सरल कविता सिखाई, जिसे मैंने सीख लिया। मुझे मज़ा आता था, इसलिए मैं अपने ढंग से पूरा दिन मस्ती में अभ्यास करता रहता था, और घर वाले भी मज़ा लेते थे।
जिस रात मेरा प्रदर्शन होना था, तब उन्होंने मुझे अपनी बनाई हुई सफेद पोशाक पहनाई और मंच के नेपथ्य में ले गईं। मैं तैयार था। मेरा नाम पुकारा गया और मम्मी ने मुझसे कहा, “जा, और कविता बोल। जो स्टेप तुझे जैसे आते हैं, वैसे कर।” मैं मंच पर गया — पर बहुत सारे लोगों के सामने, मंच से दर्शकों को देखकर घबरा गया, और मुझे याद है कि वह पोशाक भी चुभने लगी। मैं जैसे दौड़कर गया, वैसे ही लौट आया। माइक मेरे ठीक सामने था। न कविता का प्रदर्शन किया, न स्टेप का। केवल “मुझे काट रहा है” कहकर वापस आ गया। तीन बार भेजा गया, और तीनों बार मैंने वही किया। हाँ, मेरी पोशाक सबसे आगे उभरकर आ रही थी, और लोग उसे देख रहे थे। शायद मेरी पोशाक से उनके मन में मेरे प्रति अपेक्षा बढ़ गई होगी कि कुछ विशेष देखने को मिलेगा। पर मुझे लगता है कि वे निराश हुए होंगे।
मैं प्रस्तुति नहीं कर सका, और मैंने कहा कि मुझे काट रहा है, इसलिए उन्होंने मेरे कपड़े बैकस्टेज पर ही बदल दिए। कोई मार-पीट नहीं, कोई गुस्सा नहीं, कोई शब्द नहीं, कोई सीख नहीं। मुझे हल्का-सा याद है, शायद उन्होंने मुझे गले लगा लिया था। इस तरह, सार्वजनिक मंच पर मेरे जीवन का पहला अनुभव समाप्त हुआ।
उसके बाद भी जीवन में कई प्रसंग आए और गए, कई बुरी परिस्थितियाँ आईं और गईं। जब तक उनकी तबीयत अच्छी रही, तब तक मैं उनके पास जाता और कहता, “यह अच्छा हुआ है, इसमें रास्ता नहीं मिल रहा।” वे कहतीं, “(घर में बने) मंदिर में जाकर प्रार्थना कर, और मैं भी करूँगी।” और अनुष्ठान करतीं। कई बार तो बहुत देर बाद पता चलता कि उन्होंने जो अनुष्ठान किया है, वह इसी के लिए किया है। पर अधिकांशतः पता नहीं चलता था। हम बाद में पूछते भी नहीं थे, क्योंकि पता था कि अगर कहना होगा तो कह देंगी।
यह अनुष्ठान वे केवल हमारे लिए नहीं करती थीं। किसी के भी लिए करती थीं। बस कोई कह दे कि यह तकलीफ है, आप प्रार्थना कर देना — और वे कर देतीं, अनुष्ठान तक कर देतीं। शायद लोगों को भी भरोसा था कि उनकी की हुई प्रार्थनाएँ फलती हैं।
वे बहुत पढ़ी-लिखी नहीं थीं। उस ज़माने की ग्यारहवीं तक पढ़ी होंगी, शायद। उसमें भी मनुष्य-सुलभ मर्यादाएँ थीं। मुझे लगता है कि जितनी वे आध्यात्मिक जीवन के अनुरूप थीं, उतनी भौतिक जीवन में सुसंगत नहीं थीं। पर उनका मन दूसरों के दुख से दुखी होने वाला था। उनका जो पूरा व्यक्तित्व बना था, उसमें गरीबी का बहुत बड़ा हिस्सा था। जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा अभाव में बीता, फिर भी दूसरों को ठगने की वृत्ति नहीं थी। मनुष्य-जीवन के मूलभूत मूल्य उन्होंने हममें संचित करने का प्रयास किया था। मुझे याद है कि एक बार जब भूकंप में कई लोगों ने अपनी जान गँवाई थी, तब उन्होंने हमें गीता का अध्याय १५ (पुरुषोत्तम योग) पढ़ने के लिए कहा था।
पर आज जब यह सब लिख रहा हूँ, तब वे सारी घटनाएँ, तकलीफें, पीड़ाएँ, संघर्ष, गरीबी, ईश्वर के प्रति अटूट श्रद्धा, हम पर अटूट भरोसा, लोगों की तकलीफें अपने ऊपर ले लेना — यह पूरा जीवन मानस-पटल पर गुज़र रहा है।
क्या लिखूँ और क्या न लिखूँ। साने गुरुजी सच कह रहे थे। माँ के बारे में लिखना बहुत कठिन है। किसी के लिए भी अपनी माँ के लिए लिखना कठिन है।
वह माँ अब नहीं हैं, सदेह नहीं रहीं — १५ अक्टूबर २०२६ की सुबह-सवेरे उन्होंने देह-त्याग किया, और हम झुक गए।
अब उनके प्रसंग और यादें रहेंगी, जब तक हम भूल नहीं जाते।
सारतत्त्व
मुझमें अगर थोड़ी-बहुत पढ़ने की वृत्ति आई हो, तो उसका श्रेय पिता को जाता है। और अगर मैं थोड़ी-बहुत कहानियाँ कह पाता हूँ, तो उस कला और कल्पनाशक्ति का पूरा श्रेय मेरी माँ को जाता है। वे बहुत अच्छी कथाकार थीं। उनमें अद्भुत कल्पनाशक्ति थी।
रत्नकणिका
एक बार ऐसा हुआ कि घर पर मेहमान आ गए और घर में एक रुपया भी नहीं था। पिता घर पर नहीं थे। वे काम के लिए बाहर गए हुए थे। मेहमान आ गए थे, कुछ न कुछ नाश्ता तो देना ही था। घर में खाने के लिए केवल आलू थे। माँ ने आलू की सूखी सब्ज़ी बनाई, आलू का ही शीरा बनाया, और छाछ दी। मेहमान खाते गए और तारीफ़ करते गए। उन्हें पता ही नहीं चला कि सब कुछ केवल आलू से बना है। हम बच्चे एक-दूसरे की ओर देखते रहे और मन में बहुत संकोच होता रहा कि अभी भांडा फूट पड़ेगा — पर वह अवसर सुखद रूप से निकल गया। बाद में तो यह मज़ाक लंबे समय तक चलता रहा कि अच्छा हुआ घर में आलू थे, ग्वार नहीं, वरना माँ तो ग्वार की सब्ज़ी और उसका हलवा भी बना देतीं। गरीबी में हसी मज़ाक के सिवा मनोरंजन के और साधन भी कहाँ थे!
Thus said Dinesh Gajjar
Published at 11:00 pm, Mon Oct 19th 2026 from Ahmedabad, Gujarat, India.