
Art of Story Telling
एक बार की बात है, एक बिल्ली का बच्चा था...
एक बार ऐसा हुआ कि एक बिल्ली का बच्चा अंगूर की बेल के पास आया। उसे भूख लगी थी, इसलिए उसने सोचा कि उछलकर अंगूरों का एक गुच्छा तोड़ लेगा। अब बिल्ली का बच्चा कद में छोटा था। उसने कई बार छलाँग लगाई, लेकिन अंगूरों तक नहीं पहुँच पाया। इसलिए वह भी उस लोमड़ी की तरह यह कहकर चला गया कि अंगूर खट्टे हैं। चला गया?
नहीं। उसने सोचा कि लोमड़ी ने तो उसके बाद कोशिश ही नहीं की थी। हमें कोई दूसरा रास्ता ढूँढ़ना चाहिए। इसलिए बिल्ली के बच्चे ने आसपास पड़े छोटे-छोटे पत्थर इकट्ठा करने शुरू किए और फिर उनसे एक ढेर बना लिया। वह उस ढेर पर चढ़ा और छलाँग लगाई। उसे लगा कि अब वह अंगूरों के गुच्छे तक पहुँच जाएगा, उन्हें पकड़कर तोड़ लेगा और नीचे ले आएगा। लेकिन हुआ यह कि पत्थरों के ढेर से छलाँग लगाने पर वह पहले से अधिक ऊँचाई तक तो पहुँचा, लेकिन फिर भी अंगूरों के गुच्छे तक नहीं पहुँच पाया और नीचे गिर गया। उसने फिर कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हुआ। अब क्या किया जाए?
उसके मन में फिर एक विचार आया कि छलाँग लगाने के बजाय अगर वह एक डाली लेकर पत्थरों के ढेर पर चढ़े और डाली को आगे बढ़ाकर अंगूरों के गुच्छे को पकड़े, तो शायद वह उन्हें नीचे गिरा सके। इसलिए उसने एक डाली ढूँढ़ना शुरू किया। उसे एक अच्छी-सी डाली मिल गई, जिसे वह खुद उठा सकता था। उसने डाली को मुँह से पकड़ा, छोटे-छोटे पत्थरों के ढेर पर चढ़ा और डाली की मदद से अंगूरों के गुच्छे को पकड़ने की कोशिश की। दो-तीन बार कोशिश करने के बाद अंगूरों का एक अच्छा-सा गुच्छा डाली में फँस गया और खिंचकर जमीन पर गिर पड़ा। अब? क्या बिल्ली के बच्चे ने अंगूर खा लिए?
नहीं, क्योंकि वे तो धूल में गिर गए थे! इसलिए उन पर धूल लग गई थी और उन्हें साफ करना जरूरी था। फिर वह बच्चा अंगूरों के गुच्छे को उठाकर पास की नदी के किनारे ले गया और पानी में धोकर पहला अंगूर अपने मुँह में रखा। आहाहा… क्या अंगूर थे! इतने मीठे, इतने नरम और इतने स्वादिष्ट कि उनका अनुभव जीवनभर याद रह जाए। क्या अंगूर थे वे!
अब उस बच्चे के चेहरे पर खुशी के भाव, स्वाद का आनंद और तृप्ति का डकार देखकर वहाँ खड़े दूसरे बच्चे भी उत्साहित हो गए। वे उसके पास आए और बोले कि हमें भी अंगूर खाने हैं। तब उस बच्चे ने कहा, “चलो, हम सब मिलकर अंगूर तोड़ेंगे, धोएँगे और खाएँगे।”
इसलिए सभी फिर से अंगूर की बेल के पास आए। अब पहले बच्चे को पता था कि अंगूर कैसे तोड़ने हैं, लेकिन इस बार खाने वालों की संख्या अधिक थी। अब क्या किया जाए? एक ही डाली से अलग-अलग जगहों पर जाकर अंगूर तोड़े नहीं जा सकते थे। फिर उतने सारे पत्थरों के ढेर भी बनाने पड़ते। इसलिए बिल्ली के बच्चे ने दूसरे बच्चों से कहा, “अब हम सब मिलकर बच्चों का एक मीनार (पिरामिड) बनाएँगे। जो सबसे ऊपर होगा, वह अंगूर तोड़ेगा और नीचे फेंकेगा।”
सभी बच्चों ने एक घेरा बनाया। उसके ऊपर चढ़कर दूसरा घेरा बनाया और इसी तरह एक के ऊपर एक चढ़ते हुए वे अंगूरों के गुच्छों तक पहुँच गए। उन्होंने बहुत सारे गुच्छे तोड़े और नीचे जमीन पर फेंक दिए।
फिर क्या था! सभी वापस नदी के किनारे गए, अंगूरों को पानी से धोया और खाने लगे। सबने इतनी मस्ती की कि क्या बताऊँ! इसके बाद सभी फिर से अंगूर की बेल के पास आए और उसकी छाया में लेट गए। अब मेहनत भी की थी और अच्छा खाना भी खाया था, इसलिए उन्हें इतनी अच्छी नींद आई कि सभी गहरी नींद में सो गए।
अब अंगूर की बेल ने देखा कि सूरज की धूप उन बच्चों पर पड़ने लगी है। कहीं धूप से उनकी नींद में खलल न पड़ जाए! इसलिए अंगूर की बेल ने अपनी अधिक पत्तियों वाली शाखाओं को फैला दिया और इस तरह सूरज को ढक लिया कि बच्चों पर पड़ने वाली धूप रुक गई। बच्चे पूरी दोपहर बिना किसी व्यवधान के आराम से सोते रहे।
यह कहानी मैंने अपने बच्चों को 5 नवंबर 2026 की रात, उन्हें सुलाते समय, सोने से पहले की कहानी के रूप में सुनाई थी। कुछ लोगों को यह कहानी मौलिक लगेगी, तो कुछ को लगेगा कि उन्होंने इसे पहले कहीं पढ़ा है। लेकिन यह कहानी पुरानी लोमड़ी वाली कहानी से प्रेरित होकर उसे आगे बढ़ाते हुए, बच्चों के साथ बातचीत करते-करते एक नए रूप में बनती गई और मैं उसे सुनाता गया। मैं जो उन्हें बताना चाहता था, यानी कहानी के पीछे का विचार, उसे कहानी में पिरोता गया और सुनाता गया।
ऐसा नहीं है कि मैं रोज रात को उन्हें कहानी सुनाता हूँ। कभी-कभी दिन में वे बहुत शरारत करते हैं, तो मैं उनसे कहता हूँ, “मैंने वहाँ टेबल पर एक कहानी रखी थी, लेकिन तुम्हारी शरारत देखकर डर के मारे भाग गई।”
कई बार ऐसा होता है कि मुझे घर पहुँचने में देर हो जाती है और बच्चा कहानी सुनने के लिए मेरा इंतजार कर रहा होता है। लेकिन मैं थका हुआ होता हूँ, तो कहता हूँ, “आज कोई बड़ी कहानी नहीं मिली। शायद हम दो मिनट यह श्लोक बोलेंगे तो कोई छोटी-सी कहानी मिल जाएगी।” ऐसा कहकर मैं उन्हें एक छोटी कहानी सुना देता हूँ।
पूरे दिन बच्चों के व्यवहार में जो कुछ मुझे महसूस होता है, उसे कहानी में इस तरह पिरो देता हूँ कि सुनने में मजा आए। और कहानी के नाम पर उन्हें उपदेश नहीं देने चाहिए। बच्चों को कहानियाँ पसंद हैं। बच्चे ही क्यों, बड़ों को भी कहानियाँ पसंद हैं। तभी तो हमारे यहाँ इतने सारे कथाकार दिखाई देते हैं।
अगर कोई कहे कि व्यक्ति को कर्म के सिद्धांत को ध्यान में रखकर व्यवहार करना चाहिए, तो यह सिर्फ एक वाक्य है। लोग इसे सुनेंगे और भूल जाएँगे। लेकिन अगर आप इसी बात को किसी कथा में शामिल कर देंगे, तो लोग इसे तुरंत समझ जाएँगे और याद भी रखेंगे।
इसके बाद उस पर अमल करना है या नहीं, यह तो व्यक्ति पर निर्भर करता है। लेकिन कथा के माध्यम से उसे यह तो पता चल जाता है कि क्या सही है और क्या गलत। उसके अनुसार चलना है या नहीं, यह अगला कदम है।
जीवन में यह बहुत महत्वपूर्ण है कि सीखी हुई बात याद रहनी चाहिए, क्योंकि अगर वह याद रहेगी, तो निर्णय लेते समय वह सीख काम आएगी।
तो मुद्दा यह है कि अगर किसी को कहानी सुनानी हो, उसे प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करना हो और उसके माध्यम से अपनी बात समझानी हो, तो कहानी सुनाने की यह कला कहाँ से सीखी जा सकती है?
एक अच्छा कहानीकार बनने के लिए तीन महत्वपूर्ण गुण होते हैं:
- पढ़ना (या अवलोकन करना और सुनने की कला)।
- कहानी सुनाने का अभ्यास (प्रैक्टिस)।
- कल्पनाशक्ति। यदि किसी व्यक्ति को पढ़ने का शौक नहीं है, तो भी चलेगा, बशर्ते उसे अवलोकन करना आता हो। और यदि उसे अवलोकन करना नहीं आता, तो उसमें दूसरों को ध्यान से सुनने की क्षमता होनी चाहिए। क्योंकि इन सभी माध्यमों से आपको कहानी के लिए एक बीज मिल सकता है।
आपने कुछ पढ़ा हो, किसी की कथा सुनी हो, किसी व्यक्ति या घटना का अवलोकन किया हो या आज के समय के अनुसार कोई फिल्म, नाटक, सीरीज या रील देखी हो, तो आपको कहानी के लिए विषयवस्तु मिल ही जाएगी।
इस बीज को आगे कैसे बढ़ाना है, यह व्यक्ति की कल्पनाशक्ति पर निर्भर करता है, जो दूसरा गुण है। क्योंकि उस बीज को अपने तरीके से आगे बढ़ाने के लिए आपकी विचारशक्ति और कल्पनाशक्ति की भूमिका होती है।
कोई पूछ सकता है कि क्या कल्पनाशक्ति के बिना कहानी का विकास नहीं हो सकता? इस प्रश्न का उत्तर आगे मिलेगा।
किसी व्यक्ति के पास कहानी तो हो, लेकिन उसे सुनाने की कला न हो, वह सुनाते समय अटकता हो, डरता हो या बोल ही न पाता हो, तो वह कहानी सुनने वालों तक नहीं पहुँच सकती।
कहानी सुनाने के लिए व्यक्ति को स्वयं अभ्यास (प्रैक्टिस) करना पड़ता है। यह तीसरा महत्वपूर्ण गुण है। इस अभ्यास के माध्यम से व्यक्ति एक अच्छा कहानीकार बन सकता है।
कई लोग कहते हैं, “मेरे पास तो बहुत अच्छी-अच्छी कहानियाँ हैं, लेकिन आपके जैसी सुनाना मुझे नहीं आता।”
लेकिन मेरा कहना है कि आपको मेरी तरह कहानी क्यों सुनानी है? आपको तो अपने तरीके से कहानी सुनानी है। अनुसरण कीजिए, नकल नहीं। अभ्यास करने से कहानी सुनाने की कला आती है। बस, व्यक्ति में इसका शौक होना चाहिए। क्योंकि कोई भी व्यक्ति जन्म से कहानीकार नहीं होता।
अगर किसी व्यक्ति में ये तीनों गुण हों, तो क्या वह एक बेहतरीन कहानीकार बन सकता है? हाँ, बन सकता है। लेकिन प्रभावशाली कहानीकार बनने के लिए एक और महत्वपूर्ण गुण बाकी है। मूल रूप से, यह गुण इन सभी गुणों से अधिक महत्वपूर्ण है। ऊपर बताए गए तीनों गुणों—पढ़ना, कल्पनाशक्ति और अभ्यास—से भी अधिक महत्वपूर्ण है।
और वह है—दिल से कहानी सुनाना।
जो भी कहना है, उसे पूरे दिल से कहिए। अपनी संवेदनाओं को उसमें पिरोकर सुनाई गई कहानियाँ प्रभावशाली साबित होती हैं।
कई बार ऐसा होता है कि कहानीकार के पास ऊपर बताए गए गुणों में से एक भी गुण नहीं होता, फिर भी वह दिल से कहानी सुनाता है और वह कहानी प्रभाव छोड़ जाती है।
अक्सर (बल्कि ज्यादातर) ऐसा देखने में आया है कि ऊपर बताए गए तीनों गुणों के सहारे कहानीकार बहुत धारदार कहानी सुना सकता है, लेकिन वह लोगों तक नहीं पहुँचती। इसका कारण यह है कि कहानीकार दर्शकों के दिल को छू नहीं पाया।
आप अपने आसपास देखेंगे तो इसके कई उदाहरण मिल जाएँगे। जब तक आप सुनने वाले के दिल को नहीं छू पाएँगे, तब तक बाकी सब व्यर्थ है। और मैं इस गुण को सबसे ऊपर रखूँगा।
क्योंकि ज्ञान, अभ्यास और कल्पनाशक्ति हर बार आपके पास हों, यह जरूरी नहीं है। लेकिन अगर कहानी भावनाओं के साथ, दिल से सुनाई गई है, तो वह सामने वाले के मन पर अंकित हो जाएगी।
पहले के समय में जब माँ अपने बच्चों को कहानियाँ सुनाती थी, तब उसे इन सब बातों का ज्ञान नहीं होता था। उसे बस इतना पता था कि ये बच्चे हैं और मुझे इन्हें कहानी सुनानी है, ताकि उनमें अच्छे संस्कारों का सिंचन हो सके।
इसके लिए वह अपना समय, अपने विचार और अपनी संवेदनाएँ पूरी तरह कहानी सुनाने में लगा देती थी।
दिल से सुनाई गई ये कहानियाँ बच्चों को वर्षों तक याद रहती हैं।
आप देखेंगे कि दिल से सुनाई गई कहानियाँ, फिल्में, नाटक, प्रवचन, उपन्यास, लघुकथाएँ आदि, यहाँ तक कि कक्षा में पढ़ाई गई बातें भी व्यक्ति के मन पर लंबे समय तक बनी रहती हैं।
दिल से (संवेदनाओं के साथ) कहानी सुनाने के इस गुण को कई लोग नाटकीय ढंग से कहानी सुनाने के गुण के समान समझ लेते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। यह बात याद रखनी चाहिए।
इसलिए ज्ञान, अभ्यास, कल्पनाशक्ति और दिल से सुनाई गई कहानियाँ सामने वाले तक जरूर पहुँचती हैं, चाहे वह बड़ा हो या छोटा बच्चा।
यह लेख मेरे अपने अनुभवों पर आधारित है। प्रभावशाली कहानीकार बनने का यही एकमात्र तरीका हो, यह जरूरी नहीं है। दूसरों के अनुभव अलग हो सकते हैं और यहाँ कही गई बातें उन्हें स्वीकार्य न भी हों। लेकिन यह मेरे अनुभवों की कसौटी पर परखा हुआ मेरा वर्तमान विचार है।
सारतत्त्व
कुछ कहानियाँ हमें हँसाती हैं, कुछ हमें सोचने पर मजबूर करती हैं, तो कुछ ऐसी होती हैं जो लंबे समय तक हमारे साथ रहती हैं।
शायद इसी कारण हमारे जीवन में पुस्तकों का एक विशेष स्थान है। हर पुस्तक मानो एक नई दुनिया का दरवाजा खोलती है, जहाँ से हम कुछ नया देख, समझ और अनुभव कर सकते हैं।
ऐसे ही कुछ विचारों और कहानियों का एक छोटा-सा संग्रह…
One Iota At a Time: 101 Fables.
क्योंकि कुछ कहानियाँ केवल पढ़ने के लिए नहीं होतीं, बल्कि जीवन में अपने साथ रखने के लिए होती हैं।
रत्नकणिका
“भोजन, आश्रय और साथ-संगति के बाद, इस दुनिया में हमें सबसे अधिक जरूरत कहानियों की है।”
— फिलिप पुलमैन
Thus said Dinesh Gajjar
Published at 7:53 pm, Sun Nov 8th 2026 from Ahmedabad, Gujarat, India.